Wednesday, 15 March 2017

वहां से लौटते हुए..!!!


ये जो हरा रंग है,
बस उसी की फिराक में लाल होकर डोलता हूँ।
धूप को कांधे पर टांग कर...
अपनी अंगरखी की फटी जेब में पूरी दुनिया की बेचारगी ठूसकर...
पगरखी से धरती की ऊपरी नकली परत को लगातार घिसते-घिसते...
एक दिन मेरा समूचा घिस जाना ये तुम्हारा भ्रम है।
असल में यही नियति कर्म है जो मुझे ज़िंदा रखता है।

मेरे थैले में बहुत लंबी यात्रा से पायी एक बहुत भयानक चीज़ है।
माने...
मेरे पास कुछ है जो आँखें बंद करके हर किसी को देने लायक नहीं है।
जिस दिन मुझे उसका असली पात्र मिला,
मैं उसे वो सब-कुछ देकर ठीक अगले क्षण ही...विदा ले लूंगा।

मैं हारकर विदा होता हूँ ये मत सोचना कभी....
हार में तो मैं हमेशा 'रहा' हूँ। चाहे आप मेरी हर 'हार' को उलट कर देख लें।

मेरे लिए विदाई सम्मोहक है,
वो रुलाती है मगर अगली बार हंसने का भाना भी देती है।
विदाई इसलिए भी क्योंकि,
नेपथ्य में बस कोलाहल है, कोई मुकम्मल आवाज़ नहीं है मेरे लिए....!!!

#वहां_से_लौटते_हुए।
6 मार्च,2017
जोधपुर।

Monday, 27 February 2017

वो मोरचंग की धुनों सरीखी मीठी-तीखी धुनें सुनाता रहा और मैं लहराता रहा।

कल शाम बेहद खास बन गयी थी बहुत लंबी अवधि के बाद तुम्हें बड़ी आत्मीयता से सुना था और उसी की बदौलत रात देर तलक मैं अपने आप से बतियाता रहा कि कोई दिन तो होगा जब #फटी_जेब_से_एक_दिन कुछ कामयाब लम्हे निकाल कर अपनी भीतरी तपन को ठंडक दूंगा लेकिन कब....??? और मैं व्याकुल हो जाता हूँ......फिर चित्त में तुम धीरे-धीरे उतरने लगते हो और जून महीने की निदाघ तपती दुपहरी में भी अपने आप को कैसे आर्द्र किया जा सकता है ये सब बतलाते हो।

मैं तुम्हारी हर बात सच मानता हूँ मेरे प्रिय लेखक क्योंकि जानता हूँ कि ये सब तुम्हारा अपना भोगा हुआ यथार्थ है। अक्सर लोग फटी जेब से निकले उन कामयाब लम्हों को अपने हाथ चिकने कर, अपने शौक-मौज में लगा देते है या बर्बाद कर देते है पर मैं जानता हूँ कि तुमने मेरे प्रिय लेखक कभी ऐसा नहीं किया शायद इसी वजह से मैं तुमसे इतना ज्यादा प्रभावित हुआ हूँ। करते भी कैसे....?? ये लम्हे तुमने कोई अनायास और बिना प्रयास के ही प्राप्त नहीं कर लिए......तुम खूब लड़े, तपे और गलाया अपने आप को......तब कहीं जाकर तुमने कुछ प्राप्त किया होगा। तुम इनका इस्तेमाल चाहे जैसे कर सकते थे पर तुम्हें यही उचित लगा कि बस फकीरी में ही आनंद है खैर आनंद प्राप्त करने के अपने अपने मानदंड होते है कोई फकीरी से करता है तो कोई विलासिता से करता होगा।
एक बात कहूँ मेरे खास लेखक, कभी कभी कुछ लोग तुम पर हंसते है, नानाविध फब्तियां कसते है, जानता हूँ तुम्हे कोई फर्क नहीं पड़ता उनका पर मुझे वे लोग विचलित कर देते है।  तुम्हारे एकांत गीतों को वे एक अलग नजरिये से क्यों देखते है पता नहीं....?? क्या उन्हें वो पीड़ा नजर नहीं आती जो मुझे महसूस होती है...??? क्या वे तुम्हारी आँखों और चेहरे पर वो सब भाव तैरते हुए नहीं देख पाते जो मैं देख लेता हूँ..???
मैं उन लोगों से कहूंगा #इस_आदमी_को_सुनों जो कहता है कि प्रेम एक कभी न अंत होने वाली प्रार्थना है। जो कहता है हारी हुई परिस्थितियों में भी जिंदगी को #अंगूठा बताकर फिर से खड़ा हुआ जा सकता है।  ......बाकी समय भले ही ये शख्श चुप रहे लेकिन ये वहां अनायास वाचाल हो उठता है #जहाँ_आदमी_चुप_है। 
इस व्यक्तित्व को बड़े गहरे से सुनों तुम्हें कुछ खास सुनाई देगा जो सहजता से बहुत कम सुनने को मिलता है। एक बात और कहूँ, इस कवि को कभी कान से मत सुनना सब साफ़-साफ़ नहीं सुनाई देता है इसे आँखे बंद करके एक मिनट में बहत्तर बार धड़कने वाले अपने भीतरी लाल वाले कान से सुनना, तुम्हें बहुत कुछ सुनाई देगा।
जैसे -

"तुम जिस आषाढ़ को
छोड़ गई थी
वही लिए बैठा हूँ,
आओ तो
वह बरसे !!"

फोटो साभार - सवाई सिंह जी शेखावत और ईश मधु जी के एल्बम से।

Wednesday, 8 February 2017

दो आखर "चारणां री बातां" – ठा. नाहरसिंह जसोल

ठा. नाहरसिंह जसोल द्वारा लिखित पुस्तक “चारणों री बातां” की भूमिका

“दो आखर”

चारणों सारूं आदरमांन, श्रद्धा, अटूट विश्वास रजपूत रै खून में है। जुगां जुगां सूं चारणों अर रजपूतां रै गाढ़ा काळलाई सनातन संबन्ध रया है। आंपणों इतिहास, आंपणी परम्परावां, रीत-रिवाज, डिंगल साहित्य अर जूनी ऊजळी मरजादां, इण बात रा साक्षी है।

केतांन बरसां तक ओ सनातनी सम्बन्ध कायम रयौ। न्यारौईज ठरकौ हौ। पण धीरे धीरे समय पालटो खायौ अर उण सनातनी संबन्धों में कमी आण लागी। ऐक दूजा रै अठै आण-जाण कम व्हे गयो, अपणास में कमी अर खटास आय गई, ओळखांण निपट मिट गई। इण सब बातां सूं जीव कळपण लागौ अर सन् 1982 में ‘क्षत्रिय दर्शन’ नांमक मासिक पत्रिका में म्है टूटतै काळजे अेक लेख लिख्यौ, वो इण भांत है- ‘राजपूत अर चारणों रा संबन्ध’

राखण ने रजवट धरा, और न दूजी ओळ।
देवगुणां कुल् चारणां, पूजां थांरी प्रोळ।।

राजपूतों सारूं चारण जुगों-जुगों सूं पूजनीक रियो है। चारण शब्द मूंडा मांय सूं निकळतां पांण राजपूत रो माथौ श्रद्धा अर भक्ति सूं झुक जावै। राजपूत सारूं चारण आदि काळ सूं साचौ हितेषी अर साचे मारग माथै टोळणीयौ रह्यो है। चारण नें सही सूं राजपूतां रो गुरू भी कैवां तो कोई म्होटी बात नी व्हैलाः

रजवट रै चारण गुरू, चारण मरण सिखाय।
बलिहारी गुरू चारणां, खिण तप सुरग मिलाय।।

चारण, राजपूत नें अधर्म अर अनीति सूं बचावण वाळी चालती फिरती गीता, अर अंधकार सूं ऊजाळा रूपी सतमारग माथै लेजावण वाळी अखंड जोत रही है। हजारों, लाखों गीत, दोहा, छप्पय, सवैया, चारण कवीसरों रचिया वे आंपणे साहित्य रो अनमोल खजानो है।

कायर सूं कायर रजपूत नें आपरी जोशीली वांणी सूं बिड़दाय, रणखेतर में भेजण री शक्ति चारणों में हीज ही, अर मरियां पछै उणरी कीरत रा गीत रच उणने अजर अमर करण री पण खमता चारणों में हीज हीः

कायर नें लानत दीयै, सूरां नूं साबास।
रण अरियां नें त्रास दै, चारण गुण री रास।।

चारण वाणी रे ओजस रो ऐड़ो उदाहरण संसार रे इतिहास अर साहित्य में कठैई नजर नी आवै।

जस आखर लिखै न जठै, वा धरती मर जाय।
संत, सती अर सूरमा, ऐ ओझळ हो जाय।।

अर ऐ जसा रा अनमोल अर मीठा आखर लिखण वाळा और कोई नी पण चारण कवीसर ही जुगों सूं आपरो चारण धर्म निभाता आया है।

जे चारण जात नी व्हेती तो, नी तो राजपूतों रो ऊजळो इतिहास वेतो, नी वीर गाथावां वेती, नी काव्य वेतो, नी डिंगल साहित्य ही वेतो। वांणी अर कलम रा धणी इण कवीसरों वांरी ओजस्वी रचनावां, कोरी वीररस में ही नी रची। भक्ति, श्रंगार, करूण, व्यंग, हास्य, रस में अनेक रचनावां सृजित कर इतिहास अर साहित्य रो अनमोल खजानों आवण वाळी पीढि़यों सारूं छोड़, अमर व्हे गया।

जोधपुर रा महाराजा मांनसिंहजी चारणों रा अटूट पुजारी हा। घणा फूटरा आखरां में वां चारणां सारूं आपरी श्रद्धा इण मुजब दरसाईः

चारण तारण क्षत्रियां, भगतां तारण रांम।
इक अमरापुर ले चले, इक नव खंड राखै नांम।।

आगे फेर देखाओः

अकल, विद्या, चित ऊजळा, इधको घर आचार।
वधता रजपूतां विचै, चारण वातां च्यार।।

राजपूत अर चारणों रा रीत-रिवाज, खांण-पांण, पैहरवास सब एक है। फरक इतोइज है कि एक चारण है अर दूजो राजपूत। एक शरीर रा दो अंग। चारण साची कैवण में कदेई संकोच नहीं करियो नी वांरे दिल में कदेई डर रियौ। कठेई कोई राजपूत ऊंदौ कांम करियौ तो वांने फटकारण में जेज नी कीवी अर फटकारियां ई एैड़ा कड़वा आखरां में कै सीधी काळजा माथै चोट लागै।

जोधपुर रे महाराजा बखतसिंह जी जद वांरे बाप अजीतसिंहजी री हत्या करी तो चारण कवि कीकर चुप बैठा रैहताः

बखता बखत्त बाहिरा, क्युं मार्यो अजमाल।
हिन्दुवांणी रो सेवरो, तुरकोंणी रो साल।।

अर अजीतसिंहजी जद वांरी बेटी इन्दरकंवर रो डोलो बादशाह फर्रुकशियर रै भेजीयौ तौ भभूत दांन जी रौ काळजौ फाट गयौः

काळच री कुल में कमंध, राची किम या रीत।
दिल्ली डोलो भेज नैं, अभकी करी अजीत।।

इण भांत री टूटतै काळजै सूं निकलीयोड़ी फटकारों सूं मध्यकालीन साहित्य भरियौ पडि़यौ है।

जद मौकौ आयौ, इण चारण कवीसरों राजपूतों ने शरणौं देय उणां री रक्षा पण करी। राव वीरम री विधवा रांणी मांगलीयांणी जी उणां रे बेटे चूंडा ने लेय आल्हाजी चारण रे घरे शरणौ लियौ। आल्होजी नें जद चूंडा री सही जांणकारी मिळी तो उण ने महेवै जाय रावल मलीनाथजी नें सूंपियौ।

जिण जात में महान सगतां प्रगट होवे वा तो पूजनीक है हीज, अर ऐ सगतां चारण जात में हीज प्रगट हुईः

किण कुळ सूरां, किण सती, इण दो गुणां जगत्त।
तिगुण गुणां कुल चारणां, सूरां, सती, सगत्त।।

चारण कुळ में प्रगटी इण देवियां, राजपूतों ने खळखळे मन सूं आशीष देय मोटा-मोटा भूभाग रा राजा बणाया, पर, वां खुद रे जात अर कुळ मांय सूं किणनेई आशीष देय मोटा राज रो धणी नी बणायौ।

देवी आवड़जी सिंध रै सूमरों रो नाश करनै सम्माणा रे राजपूतों ने सिंध रो राज दियौ।

सन् 1302 ई. में अल्लाउद्दीन खिलजी सूं हार, हमीर मेवाड़ छोड़ गुजरात कांनी गयौ। ओठै महामाया वरवड़ीजी हमीर ने हिम्मत बंधाई, आसीरवाद दियौ अर उणने पाछौ मेवाड़ ऊपर हमलो करण री आज्ञा दी। वरवड़ीजी री कृपा सूं मेवाड़ ऊपर पाछौ सिसोदियां रो राज थिरपीजियौ।

देवी करणीजी रै प्रताप सूं जोधा नें मारवाड़ अर बीका नें बीकानेर रो राज मिल्यौ। इणीज कारण न्यारी-न्यारी राजपूत शाखाओं में कुळदेवियों रे रूप में आज ई ऐ देवियां पूजीजैः

आवड़ तूठी भाटियों, कामेही गौड़ोंह।
श्री बरबड़ सीसोदियों, करणी राठौड़ोंह।।

जद अन्याय अर स्वार्थ रे नशा में आय, दो राजपूत घरांणा एक दूजा नें खतम करण री तेवड़ी तो उण अबखी वेळा में केतांन चारणों फौज रे विचै जाय वांनै मनावण री कोशीश करी, अर जद कोई नी मांनीया तो खुद रे पेट में कटारी खाय मर गया। चारण रो खून पड़तां ही दोनू कांनी खींचीजियोड़ी तलवारों म्यानां में पाछी जावती, अर भाई-भाई रे खून रा तिरसा, नीची गाबड़ कियां पछतावा रो पोटक माथै बांध, पाछा घरे जावता। राजपूत जात सारूं इत्तो मांन, सम्मांन, अपणायत, अर प्रेम रो रिश्तो, चारणों सिवाय कुण निभावै।

महाराजा मांनसिह जी जालोर रै किला में घेरीज गया। राशन पांणी निठ गया। सिपाहीयौं रै भूखां मरण री नौबत आय गई। जद मांनसिंह जी वांरै विश्वास पात्र कवि जुगतीदांनजी वणसूर नें वौकारिया।

जुगतीदांन जी कनै पईसा कठै।

पण जिण विस्वास सूं महाराजा वांने छांटी भळाई तो उणरी तो तामील करणीज ही।

जुगतीदांनजी भेस पलट, खुद रै जीव नै जोखम में न्हांख, किले बारै निकळ गया। घरे जाय, गैणां गांठो हो, उणने बेच मांनसिंहजी री मदद कीवी।

थोड़ा दिनों पछै फेर नांणा री जरूरत पड़ी। घेरो ऊठण रा आसार दिखै नहीं। पाछा जुगतीदांन जी याद आया। जुगतीदांन जी पण पूरा सांमधरमी।

ना कीकर देवै।

भेस पलट पाछा किला बारै निकळ घरे गया। गैणां गांठो तो पेली बेच दियो। हमैं कांई बेचे। वां तो डावो देख्यौ न जीमणौ, खुद रे बेटे भैरजी नें एक महंत (भाडखै रा या खारै रा) रे ओठे अडांणे मेल रूपियो लेय मांनसिंह जी नें नजर किया।

थोड़ा दिनां सूं देवजोग सूं जोधपुर महाराजा भीमसिंह जी रो सुरगवास व्हे गयो। मांनसिंह जी ने मारवाड़ री गादी पर बैठाया।
जुगतीदांनजी रै उपकार नें राजाजी कीकर भूलता। किले माथै बुलाय, लाख पसाव देय पारलू री जागीर दीवी, अर वांने हाथी ऊपर बैठाय खुद हाथी रै आगे किला री सिरे पोळ तेक पैदल चाल वांने, नवाजिया।

राजपूत रे घर में चारण, कविराजा, बारठजी, बाबोसा, बाजीसा रे नांमां सूं जांणीजे। ऐड़ो कोई मौको नी जद राजपूत रे घरे बाजीसा नी लादै। वांरे बिना कोई मौको नी सज सकै। वांरै बिना घर रा सगळा खुशी रा मौका फीका। जद कदेई सलाह-सूद री जरूरत पड़े बुलावौ बाजीसा नें। सगाई सगणपण करणौ व्है, पूछो बाजीसा नें। दो लडि़योड़ा भायौं बिच्चे राजीपो कराणों व्है, बुलावौ बाजीसा ने। अर मरणे परणे बाजीसा रो होणो जरूरी। ब्याव, शादी, सगाई, सगपण में जठा तक बाजीसा नी पधारे, सारी सभा सूनी। ज्युं ई बाजीसा आया, सभा में रंग आय जावे। सारा ही सभासद ऊठ ने बाजीसा नें आदर देवे। ठाकर सांमां जाय पगां रे हाथ लगाय घणे मांन सूं बधाय बाजीसा ने ऊंचे आसण बैठावै। अमल री डोढ़ी मनवारों होवे और खारभजणा लियां पछे घणे जोर सूं खैंखारो कर ने सैंगही सभासदों रो ऊतरियोड़ौ अमल उगावै अर पछै बातों रा अर दूहों रा दपट्टा उडै, जिणने सुणतां कोई थाकैई नी। चिलमां और हुक्कों में पण नवी जिन्दगी आय जावै। वेई एक हाथ सूं दूजे हाथ सभा चालै जितै चालबो करे।

राजपूत घरों री सउवाळीयां आपरै बडेरां सूं, मरजाद मुजब लाज सरम करै, पड़दो राखै, पण बाजीसा सूं, कोई पड़दो नी। वे निसंकोच आंगणें आय जाय सकै। कोई समाचार बारे मिनखां में कैवाणा व्है तो बाजी सा कैहवै। बाजी सा आवे जद जांणे वांरे बाप घरे आवै जितौ कोड करे। वांने आंगणे बुलावै। ऊंचे आसन उपर बैठाय, कंकू चावळ रा तिलक करै, अर घणै कोड सूं आपरा हाथ सूं वांनें जीमावै। और जे जीमण में कमी रैय जावे तो बाजीसा रे नाराज हो जावण रौ पण डर हर घड़ी रैहवै।
टाबर तौ बाजी सा रौ एक घड़ी लारौ नी छोड़ै। बाजीसा ‘बात मांडो नी’ री जिद सूं वांने छोड़ैईज नी। जठा तक एक दो चुटकला नी सुणाय देवै, टाबर लारो नी छोड़ै। अर बाजीसा जद घणाईज काया व्हे जावै तो जेब सूं मखांणा, नवात, खाटी, मीठी, बटियां देय आपरो पिंड छुड़ावै। छोटे सूं मोटा तक बाजीसा बाजीसा करता थाकै नीं। अर बाजीसा पण वांसूं बातां और कवितावां में इत्ता रीझ जावै के खावण पीवण री सुध नी रैहवै। बाजी सा रै सभा में रैहतां, दिन कद ऊगे कद आथमें, कांई पतो नी पड़ै। ऐड़ो गहरौ सनातन राजपूतों सारूं बाजीसा सूं बढने किण रे साथे व्है सकै।

समय बीत गयौ। बातां रैय गई। मन एक ठंडो ऊंडो निसासो छोड़ नें रैय जावै। इण ठालै भूलै बदलते समय, यां दोनूं जातां रे बीच पीढि़यां रे बणियोड़े कालजा रे सनातन अर प्रेम नें झकझोर दीनो। सुरगवासी नाथुदांनजी महियारिया रो काळजो टूक-टूक व्हे गयौ जद वां इण दोनूं जातां रै आपसी सनातन में कमी आती दीठी अर आपरै हीया री ऊमस नीचे, लिखी ओळियां में निकाळीः

वे रण में बिड़दावता, वे झड़ता खग हूंत।
वे चारण किण दिस गया, किण दिस गा रजपूत।।

एक फेर कवीसर इण ही सारुं कैयो हैः

कुण तौ कैवै, कुण सुणें, दोनूं पूत कपूत।
म्हां जिसड़ा चारण रया, थां जिसड़ा रजपूत।।

जिण रजपूत रै घरे चारण रौ आण जाण होवे वो घर मंदिर ज्यूं पवित्र होवे। यां देवी पुत्रों रे संपर्क सूं सद्बुद्धि रौ संचार होवे। वांरी आशीष सूं रजपूत रो सदा ही भलो होवे, ऐड़ी म्हारी मांनता है।

ऊपर लिखिया कारणों रै कारण, मन में आई कै क्यूं नी म्हारी च्यार पांच पोथियां में छपी चारणों री न्यारी-न्यारी बातों ने भेळी कर, अेक न्यारी पोथी छपाऊं ताके चारणों री सगळी बातां अेके ठौड़ आय जावै। अर छेहली ऊमर में, जातां-जातां, इण अमोलक जात ने, इण पोथी रै पांण, छेहला जुहारड़ा कर, म्हां माथै चढि़योड़ा करज नैं थोड़ोक कम कर सकूं।

इण पोथी में आयोड़ी जूनी बातां में वां जूना मिनखां रा ऊजळा आदर्श है, त्याग है, तपस्या है, मिनखी पणा री केतांन मिसालों है। आशा है पाठकवृंद यां आदर्शों ने आपरै जीवण में ढ़ाळ, वांरो जीवन सार्थक बणावण रो जतन करसी।

दीवाळी 2011                                                               आपरोहीज
करणी कुटीर                                                           ठा.नाहरसिंह जसोल
मु.पो. जसोल

Monday, 14 November 2016

"चक्की में चक्की, चक्की में दाणा ~ कल की छुट्टी परसों आणा"

शनिवार का दिन मुझे तब से प्रिय है। जब एकसार चालीस तक पहाड़ागान करवाने के बाद हमारे गाँव वाली प्राइमरी स्कूल के इकलौते मास्साब (मास्टरजी) छाछ जैसी ठंडी सांस लेने के बाद खुद कुछ बोलने के लिए खड़े होते। गाँव-ढाणियों के लगभग सात बीसी (7×20=140) बदमाशों को दिन भर संभालने के बाद भी वो एक दम तरोताजा से लगते थे क्योंकि आज शनिवार होता था। खैर, सबसे पहले तो नाख़ून न काटने और बालों में तेल न लगाने के साथ न नहाने से होने वाले नुकसानों के बारे में एक आशुभाषण होता था जो हमेशा कुछ न कुछ बदलाव के साथ परोसा जाता था। (जो वाकई बड़ा मीठा लगता था क्योंकि कक्षा में किसी को व्यक्तिगत भाषण देते समय मास्साब साथ में चिटकी, बतासे और टिकड़ियां (सजाओं के नाम) दे देते थे।) हम सब एक दूसरे के नाख़ून देखकर वापिस अपने में रम जाते थे क्योंकि मास्साब द्वारा बोली जाने वाली अगली लाइन हमें सबसे प्यारी होती थी। मास्साब अटल बिहारी जी की तरह अपनी बात में थोड़ा सा गेप देकर बोलते, "हमे सीधा घरे जावो अर् सोमवार रा टाइम माथे आया। सिगळा ने चालीस तक पावड़ा (पहाड़े) याद होवणा चाहिजै....रोवता मति फिरिया(फालतू में इधर-उधर मत भटकना)।"
.....और सेना अपने-अपने पाटी-बस्ते समेटकर अगले ठिकाने के लिए यलगार-घोष के साथ कूच करती.....

"चक्की में चक्की, चक्की में दाणा
कल की छुट्टी, परसों आणा।"

#चिल्ड्रेन_डे

Tuesday, 30 August 2016

अनकहे इश्क की पवित्र दास्तान - "वही लड़की बार-बार..."

अनकहे इश्क की पवित्र दास्तान - "वही लड़की बार-बार..."
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निःसंदेह प्रेम क्षणिक नहीं होता वो रगों में दौड़ते खून के हर कतरे में समा जाता है जब किसी से हो जाता है, उम्र के हर पड़ाव पर बल्कि ये कहना चाहिए कि ताउम्र वो अपना एहसास दिलाता रहता है और जब प्रेम अनकहा रह जाए या उसका इजहार न किया जाए तो वो कितना बेजोड़ और एहसासमय हो जाता है कुछ ऐसा ही एहसास कराती है कमलेश तिवारी की कहानी "वही लड़की बार-बार"। मित्रों कमलेश जी एक शिक्षक है और रंगमंच की दुनिया में भी अपनी अच्छी पहचान रखते है। सूर्यनगरी के उम्दा रंगकर्मियों में इनका नाम आता है। इतना ही नहीं वॉलीवुड की भी फिल्मों में इन्होंने अभिनय किया है।  रंगमंच से गहरा सम्बन्ध है तो इनकी कहानियों में वातावरण के साथ साथ पात्रों में भी ज्यादा जीवन्तता देखने को मिलती है। एक दृश्य देखिये - "सूरज इतना नीचे सरक आया कि धूप रौशनदान से तैरती हुई नीचे वाली खिड़की की जाली को चीरती हुई रामावतारजी की आँखों में गड़ने लगी। वे तुरंत अख़बार को आँखों के आगे फैला लेते हैं। ऐसा करने में उनका उद्देश्य अख़बार पढ़ना है या धूप से बचना है, ये कहना ज़रा कठिन है। "
"वही लड़की बार बार" कहानी सुबह के सुरम्य वातावरण में शुरू होती है और एक साँझ पर आकर खत्म नहीं होती है बल्कि एक विराम लेती है असल में वो सुबह और शाम केंद्रीय पात्र रामावतार की उम्र ही है जिसका कलेवर लेखक बखूबी बुनता है। कहानी का कथ्य ही कुछ ऐसा है कि इसके पात्र जरुर बदल जाते है लेकिन ये कहानी कभी बदलती नहीं है। जो लोग अपने प्यार का इजहार कर देते है वो उस एहसास से चूक जाते है जो दिल की शिराओं से लेकर आकाश तक को कभी लाल सुर्ख होने का एहसास दिलाता है। ये एहसास ही तो व्यक्ति को बेरोक अनवरत यात्राएँ करवाता है। जहाँ वो कभी उन गलियों की, कभी उन बेतरतीब शामों की, कभी उन सूने मोड़ों की जहाँ जिंदगी सहमी हुई सी किसी खरगोश की भांति आंखें मूंदे हुए बैठी मिलती है और अनायास ही एक सरसरी शरीर के एक छोर से दूसरे छोर तक फैलती है और याद आता है वो प्यार जिसके सहारे उम्र पेंडुलम में रेत की तरह कण दर कद रिसती है। ऐसे कम लोग ही होते है जो रामावतार की तरह ये एहसास तमाम उम्र अपने साथ लेकर चलते है और वो लड़की बार बार आकर जिंदगी में कमाए हुए बेशकीमती हसीन पल खर्चने का मौका देती है।
इस कहानी की एक विशेष बात जिसने सबसे ज्यादा मेरा ध्यान आकृष्ट किया और आप भी अछूते नहीं रहेंगे वो यह कि कहानी का मुख्य पात्र कहानी के शुरू में भी अपना मुंह टेढ़ा कर लेता है या बिगाड़ लेता है व कहानी के आखिर में भी कुछ ऐसा ही करता है लेखक ने उम्र के इस पड़ाव को जिसमें अभी रामावतार है इंगित करते हुए बखूबी दिखाया है कि इस उम्र में हज़ार कोशिशों के बाद भी कोई व्यक्ति खुलकर विरोध नहीं कर सकता है या घट रही चीजों को नकार नहीं सकता है बल्कि वो सब कोन्सियस माइंड में चल रही बातों से तुलना कर हकीकत वाली बात को छोटा साबित करने के लिए मुंह बिगाड़ लेता है बस यही चारा रह जाता है। क्योंकि रामावतार के लिए दुनिया की कोई सुरीली आरती या स्वर लहरी है तो वो है सरू या सरस्वती की आवाज़ में, कपड़ों को तह करना, आरती गाना, सूजी का हलवा सब कुछ उनको सरू से जोड़ता है लेकिन सरू से अच्छा उनकी नज़र में कोई नहीं कर सकता। यही वो विराट और स्वर्णिम प्रेम है जिसके लिए हर कोई लालायित रहता है।
कहानी दो अलग अलग भौगौलिक परिवेशों को समेटे हुए है लेकिन उतराखंड वाला इश्कियाना माहौल पाठक में सहजता से उतरता है क्योंकि वहां कथानक ज्यादा प्रेममय हो जाता है। शिल्प के आधार पर बात करें तो उनका काम काफी सराहनीय है। कहानी फ्लेश-बैक शैली का सहारा लेती है जो कथ्य के हिसाब से उपयुक्त भी है।  संवाद और बिम्ब बेहद उम्दा है जो इस कहानी को विस्तार भी देते है तो दूसरी तरफ मन की परतों पर अपना मुलम्मा भी छोड़ जाते है।
कुल मिलाकर अनकहे इश्क की पवित्र दास्तान है "वही लड़की बार बार..." कमलेश जी को बहुत बहुत शुभकामनायें। उनका लेखन नित नयी ऊँचाइयों को छुए और वो ऐसी ही शानदार कहानियां पाठकों को देते रहे।
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के डी चारण
जोधपुर
29/11/2015
09782836083
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आप ये कहानी इस पते पर जाकर भी पढ़ सकते है।
http://kamaleshtewari.blogspot.in/2015/04/blog-post.html?m=1
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Wednesday, 24 August 2016

अशोक गहलोत की कविता "ख्वाबों की मौत"

अशोक गहलोत साहित्य के उन विद्यार्थियों में से है जो महज परीक्षा पास करने के लिए नहीं पढ़ते है वो साहित्य में रूचि रखने वालों में से एक है। यही नहीं वो अपनी एक राय हर तरह की कविता और कहानी पर रखते है। इतिहास और व्यवहार शास्त्र में भी गहरी रूचि होने के कारण उनकी कविताओं में सिर्फ बड़बोलापन नहीं है बल्कि वो तटस्थ रहकर अपनी कविता में विचार का एक बीज भी रखते है। यहाँ मैं उनकी एक कविता रख रहा हूँ। आप भी पढ़कर  राय दीजियेगा।

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"ख्वाबों की मौत "

ख्वाबों की तहों को खोलकर छत पर रख दिया है ,
थोड़े सूख जाएंगे,
हल्के और मुलायम हो जाएंगे,
गीले ख्वाब ।

कही भाप बन उड़ तो नहीं जाएंगे,
या परिन्दा पंजों में पकड़ ले तो नहीं जाएंगे।

नहीं नहीं ...............!

सभी के ख्वाब सूख रहे छतों पर ,
बिल्कुल ताजा है कुछ कन्या भ्रूण -से ,
कुछ है मैले कुचैले - से रद्दी और बासी ,
बेटों की चाह-से,बेकार ख्वाब ,
ढेरों ख्वाब , ख्वाबों के ढेर ।

तभी गरीब की रोटी का ख्वाब
बनकर भाप उड़ गया ,
सभी ख्वाब हँसते है ताली बजाकर ,
और किसी ख्वाब को ले गया लठैत
गिरवी बताकर ।

किसी ख्वाब को बिठा पीठपर
ले गया है  बगुला भगत,
पटक दूर चट्टान पर
नोचकर खायेगा अब ।
सभी ख्वाब उठ गये इसी तरह
बारी बारी से।

अकेला मेरा ख्वाब बचा है ,
पड़ा है बेतरतीब धूप में,
और सूखे कोर फड़फड़ाते है
घायल परिन्दे-से ,
फिर तोड़ते है दम ।

अरे !   ये क्या ?........

बिलकुल अभी गिद्ध आया है आसमान में,
तेज निगाहों से देखता है नीचे ,

मै दौङता हूँ समेटने ख्वाबों को
गिर पङता हूँ फिसलकर ,
फिर उठता हूँ ..............मगर !!!!!
गिद्ध अब वहाँ नहीं है,
ख्वाब भी नहीं है,
माँस के टुकड़ें है और खून की चंद बून्दे है ,
ये ख्वाबों की मौत है ।
                     - अशोक गहलोत

Sunday, 8 May 2016

रजनीगंधा का विपर्याय

रजनीगन्धा हूँ मैं,
रंगोआब खुशबू से शेष
जी, हां रजनीगंधा ही हूँ मैं,
वह रंगोआब, खुशबू वाला पुष्प नहीं,
जो जीवन में भाव भरता है,
नयापन लाता है।
समय रंगकर होठों की लाली बढाने वाली,
पीक के लाल छर्रों वाली,
मुलायम-कठोर कणों के गुण धर्म वाली
रजनीगन्धा ही हूँ मैं।

एक पतली परतदार चिकनी, चमकीली,
लजीज पोटली,
जिसे रसिक फाड़कर,
कुछ देर बाद,
स्वादहीन करके पीक के छर्रों से,
उगल देता है पीकदान में,
या इधर-उधर,
उछालता है हर कण,
स्वादसुधा से विभोर होकर,
कुछ तो निगल ही जाते है कमबख्त
जी, हां रजनीगंधा ही हूँ मैं।

अनवरत मेरी शार्गिदी,
अच्छी बात नहीं,
फिर मैं अपनी रक्तिमता जमाकर,
अशेष कर देती हूँ अपने ही रसिक को,
हाँ, रजनीगंधा हूँ मैं।

पीक के लाल छर्रों वाली।
जिससे वक्त का जर्रा रंगकर,
एक स्वादातुर रसिक कणों के साथ खेलता हूं,
समय को ढेलता है,
कुछ देर बाद मुझे ही धकेलता है,
आखिरकार मैं ही उसके राग का कारण बनती हूं।
रजनीगंधा हूँ मैं, जिसे कुछ लोग स्त्री कह देते है।

पीक के लाल छर्रों वाली
पतली, परतदार, चिकनी, चमकीली
लजीज पोटली।
रंगोआब, खुशबू से शेष,
जी हाँ, रजनीगंधा ही हूं मैं।  

[फोटो - साभार गूगल]