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Wednesday, 3 January 2018

उन पैरों से उठता संगीत सुना है कभी जो अपना वतन छोड़कर चलने को होते है

अपना वतन छोड़कर जाते हुए लोगों के पैरों से कैसी संगीत ध्वनि आती होगी....?? कितना दुःख होगा जो उनके पांवों की धूल संग उड़कर मातम और मौत के चित्र बनाता होगा....!


 
क्या इससे भयानक और कोई संगीत या चित्र हो सकता है.....??? अपनी जमीन से उखड़े हुए लोग कैसे जीते होंगे....?? उनके आंसू कितने खारे होंगे..??? उनका चेहरा कितना उदास और उतरा हुआ होगा...?? जब उन्हें अपने वतन की याद आती होगी तो क्या और कैसे बर्ताव करते होंगे....?? 

दुनिया की तमाम लेखनियां थककर चूर हो जायेगी इनके दर्द को लिखते-लिखते.....लेकिन इनका दर्द है कि हर बार नए सिरे से उभरेगा, हर बार किसी और जगह और अंग में उभरेगा...!! 

कितना कुछ याद आता होगा जो वे कूच करते समय छोड़कर कभी वापिस मिल जाने की एक अदनी और महीन सी प्रार्थना और दुआ के हवाले करके काली तिरपाल के नीचे ढककर चल दिए थे....ये सब कुछ दर्द का दरिया ही बनाते है...जहाँ वे खुद ही डूब जाते है....किसी तिनके तक का सहारा नहीं मिलता....।

Friday, 29 December 2017

क्या हमारा दिमाग धोखेबाज है ???

कुछ सवाल होते है जिनके उत्तर खोजते हुए लगता है जैसे जादू खोज रहे है. जादू?? असल में ये जादू भी होता कहाँ है? उत्तर साफ़ है। हमारी आँखों में, हमारे दिमाग में। जब दिमाग और आँखें दोनों एक ही चीज़ को एक ही तरीके से देखने लग जाए तो वो सब जादू सरीखा ही लगता है।  कुछ दिन पहले कुछ ऐसा ही देखा और महसूस किया। मैं बचपन से सोचता रहा कि इस दुनिया में इतने सारे लोग है और सब अलग-अलग सोचते, समझते और देखते है तो क्या कभी ऐसा भी होता है कि दो लोग एक जैसा ही काम करे और उनके काम का प्री-वर्क भी एक सरीखा ही हो?? 

प्री-वर्क माने काम से पूर्व, काम हो जाने का आभास, यह एक भ्रान्ति होती है लेकिन असल में ये काम करने की सुनियोजितता को परखने का भी तरीका है। मैं जूझता रहा, मुझे उत्तर नहीं मिला था। उस दिन शायद मैं अपने उत्तर के बहुत करीब पहुँच गया था। जब मैंने Legend DreamWorks और  Tanuj Vyas की बनायी एक शॉर्ट फिल्म देखी। जिसका नाम है थिंक पॉवर।  #Think_Power में उन्होंने अपने रचनात्मक तरीके से इसी सवाल का उत्तर देने की बखूबी जायज़ कोशिश की है।

फिल्म का दृश्य समझाते तनुज व्यास 


क्या-क्या है इस फिल्म में- 

लगभग बीस मिनट की इस शॉर्ट फिल्म में बहुत कुछ है जो नया है या नए के समकक्ष है। हमारा दिमाग बहुत ताकतवर है, वो हमसे कुछ भी करवा सकता है। इसलिए इस शरीर में दिमाग के साथ-साथ दिल भी दिया है ताकि सोच और संवेदना का सही ताना बाना बना रहे और हम आदमी बने हुए इस समाज की व्यवस्था में सुलझते-उलझते रहे। दिमाग और दिल में संतुलन कैसे बनाया जा सकता है? यह जवाब फिल्म में अँधेरे में जुगनूं सा चमकता साफ़-साफ़ नज़र आता है। तमाम घटनाओं को सरसता से पार करते हुए यह फिल्म अपने अंत में एक और सवाल दाग देती है, जो अपने आप में बहुत बड़ा है कि हमारा दिमाग हमें कैसे धोखा दे सकता है। इस शॉर्ट फिल्म में कई किरदारों में से दो किरदारों ने मुझे व्यक्तिगत रूप से आकृष्ट किया है। पहला नेमीचंद माकड़ का और दूसरा अफ़ज़ल का किरदार। अफ़ज़ल के पास स्क्रीन टाइम और डायलॉग कम होने के बावजूद बेहतरीन परफॉर्मेंस दी है। 

थिंक पॉवर की ऑन स्क्रीन टीम 
                     
                              आप भी इस फिल्म को यू-ट्यूब के इस लिंक पर देख सकते है।
https://youtu.be/ToKOvQ_CdVgथिंक पॉवर शॉर्ट फिल्म

Monday, 21 August 2017

याद चुनरिया- गाँव वाले गीत


गांव वाली स्कूल में पंद्रह अगस्त या छब्बीस जनवरी के कार्यक्रम में एक गीत हमेशा तय सा था'ले मशालें चल पड़े है लोग मेरे गांव के, अब अँधेरा जीत लेंगे लोग मेरे गांव के' ....ये गीत मुझे पसंद भी था और नापसंद भी....क्योंकि सुनने में ये गीत उस समय मुझे बहुत अच्छा लगता था। कबूतरी रंग की शर्ट और खाकी रंग की पेंट पहने चार लड़के जब इस गीत को गाते थे तो रोम-रोम उत्साह से पुलक उठता था लेकिन जैसे ही बात इस गीत को समझने की आती थी या जब मैं पीपल के गट्टे के नीचे लग रही क्लास के दौरान जब इस गीत को मन ही मन गुनगुनाता तो इसके अर्थ के बारे में सोचने लग जाता था और पहली ही लाइन पर फुल स्टॉप लग जाता था । इसका कारण था मैं 'मशालें' शब्द को 'मसाले' पढता, सुनता और समझता था और पूरे गीत का गुड़-गोबर हो जाता था....कई सालों तक सोचता रहा की मसाले लेकर चले है गांव वाले तो सब्जी बना लेंगे लेकिन अँधेरा कैसे दूर होगा....?? 
खैर, समय के घोड़े पर सवार मैं थोड़ा बड़ा हुआ तो इसका एक जुदा अर्थ मैंने अपने हिसाब से सेट कर लिया। ....और वो अर्थ था....जब मसाले लेकर सब्जी बना लेंगे, उसे खाने के बाद सब काम पर चले जायेंगे, कुछ कमा कर लाएंगे और लोग अँधेरा जीत लेंगे......कई साल यही अर्थ चला और मैं गीत गुनगुनाता रहा....। हाँ, मैं ये गीत अब भी कई बार गुनगुनाता हूँ लेकिन अब सही अर्थ पता है मगर वो विश्वास कहीं खो सा गया है जो बचपन में भ्रमित अर्थ के साथ हुआ करता था।


सधन्यवाद - के डी चारण

धूमिल की कविता "बीस साल बाद" पर दो शब्द....


हालांकि ये कविता आजादी के 20 साल बाद लिखी गयी थी लेकिन आज कॉलेज में स्टाफ के साथ आजाद भारत के विभिन्न विकास पक्षों पर चर्चा करते समय बार-बार मुझे याद आ रही थी। #धूमिल ने जो आजादी के 20 साल बाद देखा था, इसके 50 साल बाद स्थितियों में कितना और कैसा परिवर्तन आ पाया है...?? हालात गंदले है वो दिल में घिन्न भरते है और दिमाग में कीड़े सा काटता है। अनुभव कांटे से चुभते है और फरेबी आजादी का एक रिसता घाव छोड़ जाता है। कहीं लोग धर्म के नाम पर तो कहीं राजनीति के नाम पर तो कहीं वोट पाने के लालच में तो कहीं सिर्फ अपना उल्लू सीधा करने के लिए आदमी की ही साँस छीन रहा है। व्यवस्थापक समय का हवाला देते है, रक्षक ताकत बढ़ने का, नीतियां बनाने वाले बस आदेश और अध्यादेश थोक के भाव जनता पर थोंप रहे है।......आम-आदमी है जो आहत और शापित सा सब कुछ भोग रहा है कभी किसी जुमले के हवाले तो कभी किसी भाषण के नाम पर.........



बीस साल बादमेरे चेहरे में
वे आँखें वापस लौट आई हैं
जिनसे मैंने पहली बार जंगल देखा है :
हरे रंग का एक ठोस सैलाब जिसमें सभी पेड़ डूब गए हैं.

और जहाँ हर चेतावनी
खतरे को टालने के बाद
एक हरी आँख बनकर रह गई है.
बीस साल बाद
मैं अपने आप से एक सवाल करता हूं
जानवर बनने के लिए कितने सब्र की जरूरत होती है?
और बिना किसी उत्तर के चुपचाप
आगे बढ़ जाता हूं.
क्योंकि आजकल मौसम का मिजाज यूँ है
कि खून में उड़ने वाली पत्तियों का पीछा करना
लगभग बेमानी है.
दोपहर हो चुकी है
हर तरफ ताले लटक रहे हैं.
दीवारों से चिपके गोली के छर्रों
और सड़कों पर बिखरे जूतों की भाषा में
एक दुर्घटना लिखी गई है
हवा से फडफडाते हुए हिन्दुस्तान के नक़्शे पर
गाय ने गोबर कर दिया है.
मगर यह वक्त घबराए हुए लोगों की शर्म
आंकने का नहीं है
और न यह पूछने का-
कि संत और सिपाही में
देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य कौन है?
आह! वापस लौटकर
छूटे हुए जूतों में पैर डालने का वक्त यह नहीं है
बीस साल बाद और इस शरीर में
सुनसान गलियों से चोरों की तरह गुजरते हुए
अपने-आप से सवाल करता हूं-
क्या आज़ादी
सिर्फ तीन थके हुए रंगों का नाम है
जिन्हें एक पहिया ढोता है
या इसका कोई खास मतलब होता है?
और बिना किसी उतर के आगे बढ़ जाता हूं
चुपचाप......

Thursday, 27 April 2017

नोबेल पुरस्कार विजेता भारतीय विभूतियां


अब तक 5 भारतीय नागरिकों तथा 4 भारतीय मूल के नागरिकों को नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है ...!

रबिन्द्रनाथ टैगोर (1913)
रबिन्द्रनाथ टैगोर को साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए 1913 में साहित्य के नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया. उस समय वे यह पुरस्कार प्राप्त करने वाले पहले गैर यूरोपीय व्यक्ति थे. उनके द्वारा रचित ‘गीतांजली’, ‘राष्ट्रवाद’ तथा ‘गोरा’ आदि पुस्तकें आज भी लोगों के बीच अत्यधिक प्रसिद्ध हैं. वे एकमात्र ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने दो देशों (भारत और बांग्लादेश) के लिए राष्ट्रगान लिखा.

सी वी रमन (1930)
भारत के महान वैज्ञानिक सी वी रमन को भौतिकी के क्षेत्र में अद्वितीय योगदान के कारण वर्ष 1930 में भौतिकी का नोबल पुरस्कार प्रदान किया गया. उन्होंने अपने शोध द्वारा यह सिद्ध किया था कि प्रकाश के पारदर्शी माध्यम से गुजरने पर उसकी तरंगों की लम्बाई में परिवर्तन आता है. इस शोध को आगे चलकर रमन इफ़ेक्ट के नाम से जाना गया.

मदर टेरेसा (1979)
विश्व भर में प्रेम और सेवा भाव का प्रसार करने वाली समाजसेवी मदर टेरेसा को पीड़ितों तथा निराश्रितों की सहायता करने हेतु वर्ष1979 में नोबल शांति पुरस्कार प्रदान किया गया.  मदर टेरेसा अल्बानिया मूल की थीं लेकिन उन्होंने कोलकाता में निर्धनों तथा पीड़ितों को अपना जीवन समर्पित किया. उनकी संस्था मिशनरीज़ ऑफ़ चैरिटी आज भी इसी काम में जुटी है.

अमर्त्य सेन (1998)
भारतीय अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन को वर्ष1998 में अर्थशास्त्र का नोबल पुरस्कारदिया गया. उनके द्वारा लिखित पुस्तक ‘द आरग्यूमेंटेटिव इंडियन’ के लिए वे काफी चर्चित रहे लेकिन अर्थशास्त्र में उनका काम उल्लेखनीय रहा है.
उन्होंने विश्व को असमानता पर सिद्धांत से जागरुक करवाया तथा बताया कि भारत और चीन में महिलाओं के अपेक्षा पुरुषों की संख्या ज्यादा क्यों है. साथ ही उन्होंने इस पर भी प्रकाश डाला कि पश्चिमी देशों में मृत्यु दर में कमी के क्या कारण हैं.

कैलाश सत्यार्थी (2014)
बच्चों के अधिकारों के हक में तथा बाल मजदूरी के खिलाफ विश्वव्यापी आंदोलन चला रहे समाजसेवी कैलाश सत्यार्थी को वर्ष 2014 नोबल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया. वे ‘बचपन बचाओ आंदोलन’ तथा 'ग्लोबल मार्च अगेंस्ट चाइल्ड लेबर' नामक संस्थाओं द्वारा अभियान चलाते हैं. इस संस्था द्वारा बच्चों को मजदूरी से छुडवाकर उन्हें समाज की मुख्यधारा में शामिल किया जाता है.


भारतीय मूल के चार विजेता जिन्हें नोबल पुरस्कार मिला –

हरगोबिन्द खुराना (1968)
भारतीय मूल के वैज्ञानिक हरगोबिन्द खुराना को वर्ष 1968 में मेडिसिन के क्षेत्र में नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया. उनके द्वारा किये गये शोध में यह बताया गया कि एंटी बायोटिक्स लेने पर इसका शरीर पर किस प्रकार प्रभाव होता है. भारत में पंजाब में जन्मे खुराना ने अमेरिका के एमआईटी संस्थान से शिक्षा प्राप्त करने के बाद वहीं की नागरिकता प्राप्त की.

सुब्रह्मण्यन् चन्द्रशेखर (1983) 
सुब्रह्मण्यन् चन्द्रशेखर को 1983 में भौतिकी में नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया. चंद्रशेखर ने पूर्णतः गणितीय गणनाओं और समीकरणों के आधार पर `चंद्रशेखर सीमा' का विवेचन किया तथा सभी खगोल वैज्ञानिकों ने पाया कि सभी श्वेत वामन तारों का द्रव्यमान चंद्रशेखर द्वारा निर्धारित सीमा में ही सीमित रहता है.

वेंकट रामाकृष्णन (2009) 
मदुरै में जन्मे भारतीय मूल के वेंकट रामाकृष्णन को 2009 में राइबोसोम के स्ट्रक्चर और कार्यप्रणाली के क्षेत्र में शोध के लिएकेमिस्ट्री का नोबेल पुरस्कार दिया गया. वे कैम्ब्रिज विश्विद्यालय में अध्यापन करते हैं तथा वैज्ञानिकों का मार्गदर्शन करते हैं.

वी एस नायपॉल (2001)
विद्याधर सूरजप्रसाद नायपॉल को 2001 में साहित्य के क्षेत्र में नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया. उनके प्रसिद्ध उपन्यासों में ‘हाउस ऑफ़ मिस्टर बिस्वास’, इन अ फ्री स्टेट, अ बेंड इन द रिवर आदि शामिल हैं. त्रिनिदाद एंड टोबैगो में जन्मे नायपॉल के पूर्वज भारत में गोरखपुर के रहने वाले थे.

Monday, 14 November 2016

"चक्की में चक्की, चक्की में दाणा ~ कल की छुट्टी परसों आणा"

शनिवार का दिन मुझे तब से प्रिय है। जब एकसार चालीस तक पहाड़ागान करवाने के बाद हमारे गाँव वाली प्राइमरी स्कूल के इकलौते मास्साब (मास्टरजी) छाछ जैसी ठंडी सांस लेने के बाद खुद कुछ बोलने के लिए खड़े होते। गाँव-ढाणियों के लगभग सात बीसी (7×20=140) बदमाशों को दिन भर संभालने के बाद भी वो एक दम तरोताजा से लगते थे क्योंकि आज शनिवार होता था। खैर, सबसे पहले तो नाख़ून न काटने और बालों में तेल न लगाने के साथ न नहाने से होने वाले नुकसानों के बारे में एक आशुभाषण होता था जो हमेशा कुछ न कुछ बदलाव के साथ परोसा जाता था। (जो वाकई बड़ा मीठा लगता था क्योंकि कक्षा में किसी को व्यक्तिगत भाषण देते समय मास्साब साथ में चिटकी, बतासे और टिकड़ियां (सजाओं के नाम) दे देते थे।) हम सब एक दूसरे के नाख़ून देखकर वापिस अपने में रम जाते थे क्योंकि मास्साब द्वारा बोली जाने वाली अगली लाइन हमें सबसे प्यारी होती थी। मास्साब अटल बिहारी जी की तरह अपनी बात में थोड़ा सा गेप देकर बोलते, "हमे सीधा घरे जावो अर् सोमवार रा टाइम माथे आया। सिगळा ने चालीस तक पावड़ा (पहाड़े) याद होवणा चाहिजै....रोवता मति फिरिया(फालतू में इधर-उधर मत भटकना)।"
.....और सेना अपने-अपने पाटी-बस्ते समेटकर अगले ठिकाने के लिए यलगार-घोष के साथ कूच करती.....

"चक्की में चक्की, चक्की में दाणा
कल की छुट्टी, परसों आणा।"

#चिल्ड्रेन_डे

Tuesday, 30 August 2016

अनकहे इश्क की पवित्र दास्तान - "वही लड़की बार-बार..."

अनकहे इश्क की पवित्र दास्तान - "वही लड़की बार-बार..."
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निःसंदेह प्रेम क्षणिक नहीं होता वो रगों में दौड़ते खून के हर कतरे में समा जाता है जब किसी से हो जाता है, उम्र के हर पड़ाव पर बल्कि ये कहना चाहिए कि ताउम्र वो अपना एहसास दिलाता रहता है और जब प्रेम अनकहा रह जाए या उसका इजहार न किया जाए तो वो कितना बेजोड़ और एहसासमय हो जाता है कुछ ऐसा ही एहसास कराती है कमलेश तिवारी की कहानी "वही लड़की बार-बार"। मित्रों कमलेश जी एक शिक्षक है और रंगमंच की दुनिया में भी अपनी अच्छी पहचान रखते है। सूर्यनगरी के उम्दा रंगकर्मियों में इनका नाम आता है। इतना ही नहीं वॉलीवुड की भी फिल्मों में इन्होंने अभिनय किया है।  रंगमंच से गहरा सम्बन्ध है तो इनकी कहानियों में वातावरण के साथ साथ पात्रों में भी ज्यादा जीवन्तता देखने को मिलती है। एक दृश्य देखिये - "सूरज इतना नीचे सरक आया कि धूप रौशनदान से तैरती हुई नीचे वाली खिड़की की जाली को चीरती हुई रामावतारजी की आँखों में गड़ने लगी। वे तुरंत अख़बार को आँखों के आगे फैला लेते हैं। ऐसा करने में उनका उद्देश्य अख़बार पढ़ना है या धूप से बचना है, ये कहना ज़रा कठिन है। "
"वही लड़की बार बार" कहानी सुबह के सुरम्य वातावरण में शुरू होती है और एक साँझ पर आकर खत्म नहीं होती है बल्कि एक विराम लेती है असल में वो सुबह और शाम केंद्रीय पात्र रामावतार की उम्र ही है जिसका कलेवर लेखक बखूबी बुनता है। कहानी का कथ्य ही कुछ ऐसा है कि इसके पात्र जरुर बदल जाते है लेकिन ये कहानी कभी बदलती नहीं है। जो लोग अपने प्यार का इजहार कर देते है वो उस एहसास से चूक जाते है जो दिल की शिराओं से लेकर आकाश तक को कभी लाल सुर्ख होने का एहसास दिलाता है। ये एहसास ही तो व्यक्ति को बेरोक अनवरत यात्राएँ करवाता है। जहाँ वो कभी उन गलियों की, कभी उन बेतरतीब शामों की, कभी उन सूने मोड़ों की जहाँ जिंदगी सहमी हुई सी किसी खरगोश की भांति आंखें मूंदे हुए बैठी मिलती है और अनायास ही एक सरसरी शरीर के एक छोर से दूसरे छोर तक फैलती है और याद आता है वो प्यार जिसके सहारे उम्र पेंडुलम में रेत की तरह कण दर कद रिसती है। ऐसे कम लोग ही होते है जो रामावतार की तरह ये एहसास तमाम उम्र अपने साथ लेकर चलते है और वो लड़की बार बार आकर जिंदगी में कमाए हुए बेशकीमती हसीन पल खर्चने का मौका देती है।
इस कहानी की एक विशेष बात जिसने सबसे ज्यादा मेरा ध्यान आकृष्ट किया और आप भी अछूते नहीं रहेंगे वो यह कि कहानी का मुख्य पात्र कहानी के शुरू में भी अपना मुंह टेढ़ा कर लेता है या बिगाड़ लेता है व कहानी के आखिर में भी कुछ ऐसा ही करता है लेखक ने उम्र के इस पड़ाव को जिसमें अभी रामावतार है इंगित करते हुए बखूबी दिखाया है कि इस उम्र में हज़ार कोशिशों के बाद भी कोई व्यक्ति खुलकर विरोध नहीं कर सकता है या घट रही चीजों को नकार नहीं सकता है बल्कि वो सब कोन्सियस माइंड में चल रही बातों से तुलना कर हकीकत वाली बात को छोटा साबित करने के लिए मुंह बिगाड़ लेता है बस यही चारा रह जाता है। क्योंकि रामावतार के लिए दुनिया की कोई सुरीली आरती या स्वर लहरी है तो वो है सरू या सरस्वती की आवाज़ में, कपड़ों को तह करना, आरती गाना, सूजी का हलवा सब कुछ उनको सरू से जोड़ता है लेकिन सरू से अच्छा उनकी नज़र में कोई नहीं कर सकता। यही वो विराट और स्वर्णिम प्रेम है जिसके लिए हर कोई लालायित रहता है।
कहानी दो अलग अलग भौगौलिक परिवेशों को समेटे हुए है लेकिन उतराखंड वाला इश्कियाना माहौल पाठक में सहजता से उतरता है क्योंकि वहां कथानक ज्यादा प्रेममय हो जाता है। शिल्प के आधार पर बात करें तो उनका काम काफी सराहनीय है। कहानी फ्लेश-बैक शैली का सहारा लेती है जो कथ्य के हिसाब से उपयुक्त भी है।  संवाद और बिम्ब बेहद उम्दा है जो इस कहानी को विस्तार भी देते है तो दूसरी तरफ मन की परतों पर अपना मुलम्मा भी छोड़ जाते है।
कुल मिलाकर अनकहे इश्क की पवित्र दास्तान है "वही लड़की बार बार..." कमलेश जी को बहुत बहुत शुभकामनायें। उनका लेखन नित नयी ऊँचाइयों को छुए और वो ऐसी ही शानदार कहानियां पाठकों को देते रहे।
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के डी चारण
जोधपुर
29/11/2015
09782836083
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आप ये कहानी इस पते पर जाकर भी पढ़ सकते है।
http://kamaleshtewari.blogspot.in/2015/04/blog-post.html?m=1
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Monday, 18 January 2016

मेरा मौन

मुझमें एक मौन मचलता है,

भावों में आवारा घुलकर मस्त डोलता है,

मुझमें एक मौन मचलता है।

 

शिशुओं की करतल चालों में,

आवारा यौवन सालों में,

मदिरा के उन्मत प्यालों में,

बुढ्ढे काका के गालों में, रोज बिलखता है।

मुझमें एक मौन मचलता है।


लैला मज़नू की गल्पें सुनकर,

औरों की आँखों से छुपकर,

भीतर मन की दशा समझकर,

प्रेम वेदना मे आतप हो , रोज दहकता है।

मुझमें एक मौन मचलता है।


कर खाली अपनी झोली को,

पैमानों से पार उतरकर,

पुष्प कुंज का भौरा बनकर,

कलियों की अभिलाषा सुनकर, रोज बहकता है।

मुझमें एक मौन मचलता है।

 

श्वेद् कणों का परख पऱिश्रम,

खुद में भरता है बल-विक्रम,

आशाओं की लाद गठरिया,

अथक परिश्रम के अश्वों संग,रोज विचरता है।

मुझमें एक मौन मचलता है।

 

पथिकों को एक राह दिखाकर,

मन का मैला भाव मिटाकर,

विरोचित कार्यों में लगकर,

स्वाभिमान की हुँकारों में, रोज गरजता है।

मुझमें एक मौन मचलता है।

 

ड्योढी के उस पार मचलता,

शोक सभाओं मे मुरझाता,

पल-पल खुद को पुष्ट बताता,

मूक बधिरो के हाथों में, रोज उलझता है।

मुझमें एक मौन मचलता है।

 

 न्याय सभा से छुपके करते,

कौड़ी के खातिर जो मरते,

घूस खोर सत्ताधारी संग,

लोकतंत्र की पासवान को, रोज निरखता है।

मुझमें एक मौन मचलता है।


गांधी का दिग्दर्शन पढ़कर,

प्रेमचंद का मर्म समझ कर,

राष्ट्र धर्म की ओढ़ चदरिया,

चिकनी चुपड़ी चाट रहे,श्वानों पर रोज बिफरता है

मुझमे एक मौन मचलता है।